
पटना में एक ऐसा नाम जो हर दर्द पर मरहम बन जाता है
पटना की वो रौशनी, जो हर अंधेरे में उम्मीद की किरण बन जाती है — एम. फिरोज “सोनू भाई”, फुलवारीशरीफ के मसीहा
पटना (THT)। जब शहर की रफ्तार इंसानियत को पीछे छोड़ रही हो, जब रिश्ते मतलब में सिमटते जा रहे हों, ऐसे समय में कोई अगर निस्वार्थ भाव से हर बेबस चेहरे की मुस्कान बन जाए — तो वो सिर्फ इंसान नहीं, इंसानियत का आईना होता है।
फुलवारीशरीफ की हर धड़कन, हर गली आज एक ही नाम से साँस लेती है — “सोनू भाई”।
न कोई ओहदा, न कोई सत्ता — लेकिन फिर भी हर दिल में बसा हुआ एक नाम: एम. फिरोज, जिन्हें लोग मोहब्बत से सोनू भाई कहते हैं। वो जो मदद करने से पहले तस्वीर नहीं खिंचवाते, जो दर्द देखकर कैमरा नहीं, बल्कि दिल निकाल कर सामने रख देते हैं।
> ❝“जहाँ तकलीफ हो, वहाँ सोनू भाई की परछाई भी राहत बन जाती है।”❞
पत्रकार नहीं, जनसेवक हैं वो — एक ऐसा कलमकार, जिसने शब्दों से जज़्बातों को जोड़ दिया
पत्रकारिता उनके लिए पेशा नहीं, सेवा का एक जरिया है। जब किसी गरीब की आँखों में आँसू आते हैं, तो सोनू भाई की रातें करवटों में कटती हैं। वह किसी की चीख नहीं सुनते — महसूस करते हैं।
> “एक माँ ने मजबूरी में अपनी नवजात बेटी को बेच दिया था... सोनू भाई ने उस बच्ची को 13 साल पहले वापस दिलवाया। आज वो बच्ची मुस्कुरा रही है, स्कूल जा रही है — और वो माँ हर रोज सोनू भाई के लिए दुआ मांगती है।”
उनका धर्म है ‘दर्द’ का साथ देना
सोनू भाई के लिए कोई हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई नहीं — बस एक ही पहचान है: “तकलीफ में इंसान”।
कभी किसी छात्र की फीस भर देते हैं, कभी किसी मरीज़ के लिए अस्पताल में खून लेकर खुद खड़े हो जाते हैं, तो कभी रात 2 बजे भूख से तड़पते किसी परिवार के लिए राशन पहुंचा देते हैं।
> ❝“जो तकलीफ में है, वो मेरा है” — यही उनका मज़हब है, यही उनकी सियासत।❞
हर दिन एक संघर्ष, हर रात किसी राहत की कहानी
हर सुबह उनके लिए किसी ज़रूरतमंद की उम्मीद से शुरू होती है। कोई कैंसर से जूझ रहा होता है, कोई बच्चा स्कूल जाने को तरस रहा होता है — और हर किसी की उम्मीद में एक नाम गूंजता है: “सोनू भाई से हो जाएगा।”
फुलवारी के जुल्फेकार हों या शिव पूजन राय, आज़ाद हों या आफताब, आलिया, अरमान, रेयाज सभी से बात करने पर एक ही नाम लिया — हर जुबां पर एक ही बात है:
> ❝“हमने आज तक ऐसा इंसान नहीं देखा — जो खुद के लिए नहीं, सिर्फ और सिर्फ दूसरों के लिए जीता हो।”❞
*आधी तनख्वाह समाज के नाम — और पूरा दिल इंसानियत के नाम
मदद के लिए किसी बड़ी तिजोरी की जरूरत नहीं होती, सिर्फ बड़ा दिल चाहिए — और सोनू भाई का दिल... वाकई बेमिसाल है। अपने वेतन का आधा हिस्सा वो हर महीने उन लोगों के लिए खर्च करते हैं, जिन्हें दुनिया भूल जाती है।
*गुमनाम नायक, जो सोशल मीडिया पर नहीं, लोगों के दिलों में ट्रेंड करते हैं
*जहाँ समाज सेवा आज स्टोरी और पोस्ट तक सिमट गई है, वहाँ सोनू भाई बिना लाइक्स, बिना तालियों के, सिर्फ दिलों में जगह बनाते हैं।
*वो हमें सिखाते हैं कि बदलाव के लिए पद नहीं, पैशन चाहिए। कोई सरकार नहीं, बस संवेदनशीलता चाहिए।
अगर आप भी इंसानियत के इस कारवां से जुड़ना चाहते हैं — तो किसी ज़रूरतमंद की मदद करके, इस मिशन को आगे बढ़ाएं।
क्योंकि जब तक इस ज़मीन पर सोनू भाई जैसे लोग हैं, तब तक इंसानियत ज़िंदा है।
आप उनसे 8709270197 पर जुड़ सकते हैं — एक इंसान नहीं, इंसानियत की आवाज़ से।